श्मशान में साधना करता अघोरी साधु, जो जीवन और मृत्यु से परे अघोर मार्ग को दर्शाता है
आज की कहानी उस दुनिया की है, जिसके बारे में बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन सच्चाई तक बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं। यह कहानी है अघोरियों की—एक ऐसी दुनिया, जो डर, रहस्य और गहरी साधना से भरी हुई है।
अघोरी शब्द सुनते ही आम इंसान के मन में श्मशान, खोपड़ियां, राख, तंत्र-मंत्र और अंधेरी रातों की तस्वीर उभर आती है। लेकिन अघोर का असली मतलब इससे बिल्कुल अलग है। अघोर का अर्थ है—जिससे घृणा न हो। यानी वह अवस्था, जहां इंसान अच्छे-बुरे, पवित्र-अपवित्र, सुंदर-कुरूप और जीवन-मृत्यु के फर्क से ऊपर उठ चुका हो। अघोरी वही होता है, जिसने अपने मन से डर और नफरत दोनों को पूरी तरह निकाल दिया हो।
अघोरी मुख्य रूप से भगवान शिव और मां काली के उपासक माने जाते हैं। उनका विश्वास है कि इस सृष्टि का आरंभ और अंत दोनों शिव में ही समाया है। इसलिए वे शिव को ही सर्वस्व मानते हैं। उनके लिए मोक्ष, पुनर्जन्म और मुक्ति का रास्ता केवल शिव साधना से होकर जाता है। यही वजह है कि अघोरी आम समाज की भीड़ से दूर रहते हैं और श्मशान जैसे स्थानों को अपनी साधना के लिए चुनते हैं।
श्मशान आम इंसान के लिए डर और अशुभ का प्रतीक होता है, लेकिन अघोरी के लिए यह सत्य का सबसे बड़ा पाठशाला है। श्मशान में इंसान को यह एहसास होता है कि शरीर नश्वर है, सत्ता, पैसा, सुंदरता और रिश्ते—सब यहीं खत्म हो जाते हैं। अघोरी इसी सच्चाई के बीच रहकर साधना करते हैं, ताकि मृत्यु का डर पूरी तरह खत्म हो जाए।
अघोरी बनना किसी भी इंसान के लिए आसान नहीं होता। यह कोई पहनावा या दिखावा नहीं है, बल्कि वर्षों की कठोर तपस्या और कठिन परीक्षाओं का रास्ता है। सबसे पहली परीक्षा होती है मन की। जब तक इंसान के भीतर गुस्सा, घृणा, जलन और अहंकार है, तब तक वह अघोर मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। कहा जाता है कि अघोरी वही बन सकता है, जिसके लिए अपना-पराया, दोस्त-दुश्मन सब एक समान हो जाएं।
इसके बाद श्मशान में अकेले रहना, अंधेरी रातों में साधना करना और मौत के विचार से दोस्ती करना इस मार्ग का हिस्सा होता है। जहां आम इंसान लाश, कफन और चिता से डरकर भागता है, वहीं अघोरी इन्हीं के बीच बैठकर ध्यान करता है। उनका उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि डर को खत्म करना होता है।
खाने-पीने और जीवनशैली को लेकर अघोरियों के बारे में सबसे ज्यादा चर्चाएं होती हैं। आम समाज जिन चीजों को गंदा या अपवित्र मानता है, अघोरी उनसे घृणा नहीं करते। उनके लिए स्वाद, बदबू, सुंदरता या घिन जैसी कोई चीज नहीं होती। उनका मानना है कि जब तक इंसान इन भेदों में उलझा रहेगा, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता। इसी सोच के कारण लोग अघोरियों को देखकर डर जाते हैं और उन्हें समझे बिना ही गलत धारणाएं बना लेते हैं।
काला जादू और तंत्र-मंत्र को लेकर भी अघोरियों का नाम लिया जाता है। सच्चाई यह है कि अघोर परंपरा में शक्ति का उपयोग केवल साधना और भलाई के लिए माना गया है। जो लोग अघोरी का वेश धारण कर डर फैलाते हैं, पैसे ऐंठते हैं या नुकसान पहुंचाते हैं, वे असली अघोरी नहीं होते। ऐसे लोग सिर्फ लोगों के डर का फायदा उठाते हैं। असली अघोरी प्रचार से दूर रहते हैं और किसी को डराने में विश्वास नहीं रखते।
अघोरी आमतौर पर दिखाई नहीं देते। वे न समाज में घुलते-मिलते हैं और न ही अपनी पहचान जाहिर करते हैं। कुंभ मेले के दौरान ही कई बार अघोरियों की झलक आम लोगों को दिन के उजाले में मिलती है। बाकी समय वे श्मशान, जंगलों या निर्जन स्थानों में अपनी साधना में लीन रहते हैं। इतिहासकारों के अनुसार अघोर परंपरा की जड़ें बनारस और गंगा किनारे बसे श्मशानों से जुड़ी हुई हैं, जहां मृत्यु और शिव आराधना एक साथ दिखाई देती है।
अघोरियों का जीवन यह सिखाता है कि डर बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है। जिस दिन इंसान अपने मन के डर, घृणा और अहंकार पर जीत हासिल कर लेता है, उसी दिन वह मुक्त होने की ओर पहला कदम बढ़ा देता है। अघोरी उसी रास्ते के यात्री हैं, जो बहुत कम लोग चुन पाते हैं।
कुल मिलाकर अघोरियों की दुनिया सिर्फ डरावनी कहानियों की दुनिया नहीं है। यह त्याग, तपस्या, आत्मज्ञान और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने की कठिन यात्रा है। अफ़वाहों से हटकर अगर इसे समझा जाए, तो यह इंसान को खुद से मिलने का एक अलग ही रास्ता दिखाती है।
आज की कहानी में बस इतना ही।
अगली कहानी और एक नए रहस्य के साथ फिर मुलाकात होगी।
तब तक अपना ख्याल रखिए।