ढाका की सड़कों पर तनाव और हिंसा का माहौल
ढाका की हवा में उस रात अजीब बेचैनी थी।
शहर अभी-अभी एक खबर से हिला था—छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत। लोग सड़कों पर थे, नारों में गुस्सा था और आंखों में आग। सरकार पर सवाल थे, चुनाव पर शोर था, और हर बातचीत में राजनीति घुली हुई थी।
उसी शहर के एक कोने में, कपड़ों की एक फैक्ट्री के बाहर, दीप्पू चंद्र दास चाय की दुकान पर बैठा था। बारह घंटे की शिफ्ट के बाद चाय की एक प्याली—बस इतना ही उसका सुकून था। बातों-बातों में धर्म का जिक्र आ गया। किसी ने कहा, “जुम्मे के बाद सब माफ हो जाता है।”
दीप्पू ने बस इतना पूछा—“तो गलत काम क्यों करना?”
यहीं से कहानी ने करवट ली।
कुछ शब्द, कुछ कान, और फिर अफवाह।
“उसने हमारे धर्म के खिलाफ कहा।”
“वो निंदा कर रहा था।”
दीप्पू चुपचाप फैक्ट्री के अंदर चला गया। उसे क्या पता था कि बाहर उसके नाम पर भीड़ इकट्ठा हो रही है। मैनेजर पर दबाव बढ़ा—“इसे निकालो, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।”
पुलिस को बुलाना चाहिए था। गेट बंद रखना चाहिए था।
लेकिन डर ने फैसला कर लिया।
गेट खुला।
भीड़ अंदर घुसी। दीप्पू को पकड़कर बाहर खींचा गया। सवाल नहीं हुए, सफाई नहीं सुनी गई। लात-घूंसे, चीखें, कपड़े फाड़ दिए गए।
और फिर—एक पेड़।
इंसान को नंगा कर, पेड़ से लटका दिया गया।
कैमरे चले।
इंसानियत ठहर गई।
जब खबर फैली, तो दुनिया ने देखा—किसी राजनीति का हिस्सा न रहा एक मजदूर, एक बेटा, एक भाई, सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह अलग था। बाद में जांच हुई—उसने कभी किसी धर्म पर कुछ लिखा ही नहीं था। न राजनीति, न नफरत—सिर्फ मेहनत।
उधर शहर में प्रदर्शन जारी थे। सरकार हादी के समर्थकों को शांत करने में लगी थी। दीप्पू की मौत फाइलों में सिमटती जा रही थी। कुछ गिरफ्तारियां दिखीं, पर असली चेहरे खुलेआम घूमते रहे।
लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा—
“जब पता था बाहर गिद्ध बैठे हैं, तो गेट क्यों खोला?”
इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।
ढाका की उस रात ने एक बात साफ कर दी—
जब राजनीति आग बन जाती है,
और भीड़ जज बनती है,
तो सबसे पहले इंसानियत मरती है।
और दीप्पू…
वो बस गलत वक्त पर, गलत शहर में, सही सवाल पूछ बैठा था।