8 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा रद्द की, जांच और सबूतों पर उठे सवाल
यह कहानी किसी एक आरोपी की नहीं है, यह कहानी उस सिस्टम की है जो कभी किसी को फांसी तक पहुँचा देता है और फिर सालों बाद कहता है — गलती हो गई।
साल 2017, चेन्नई।
एयरपोर्ट के पास एक बस्ती।
एक साधारण परिवार और उनकी सात साल की बेटी।
5 फरवरी की शाम बच्ची अचानक गायब हो जाती है। तलाश होती है, लेकिन कुछ नहीं मिलता। कुछ दिनों बाद उसी इलाके से थोड़ी दूरी पर बच्ची की जली हुई लाश मिलती है।
इल्जाम उसी मोहल्ले में रहने वाले 30 साल के दशनाथ पर लगता है।
कहानी खड़ी की जाती है “लास्ट सीन थ्योरी” पर — किसी ने कहा, आख़िरी बार बच्ची को उसी के साथ देखा गया था।
पुलिस सबूत पेश करती है —
CCTV की कहानी,
बाइक पर बैग,
डीएनए रिपोर्ट,
अंडरगारमेंट से सीमन मिलने का दावा।
लेकिन असलियत में क्या था?
जिस CCTV पर पूरा केस खड़ा किया गया, वो फुटेज कभी कोर्ट में पेश ही नहीं हुई।
गवाह कहता है — मैंने आरोपी को एक दिन पहले देखा था, जिस दिन बच्ची गायब ही नहीं हुई थी।
जिस “आख़िरी गवाह” की वजह से फांसी मिली, उसकी गवाही दो महीने बाद दर्ज हुई — FIR में उसका नाम तक नहीं।
और सबसे अहम सबूत —
बच्ची का अंडरगारमेंट, जिस पर डीएनए मिलने का दावा किया गया,
वो चार महीने बाद आरोपी के बैग से बरामद दिखाया गया।
जबकि मेडिकल साइंस साफ कहता है —
सीमन के सेल 48 घंटे से ज़्यादा जिंदा नहीं रहते।
मोबाइल की कहानी भी ढह गई।
जिस फोन को आरोपी का बताया गया, उसका सिम किसके नाम था — पुलिस ये तक साबित नहीं कर पाई।
ना कॉल डिटेल, ना डेटा, कुछ नहीं।
इसके बावजूद,
लोअर कोर्ट और फिर मद्रास हाई कोर्ट —
दोनों ने दशनाथ को फांसी की सजा सुना दी।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: सबूत कहां हैं?
आठ साल बाद, 2025 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है।
एक-एक सबूत को खंगाला जाता है।
और सुप्रीम कोर्ट कहता है —
यह केस सबूतों पर नहीं, मान्यताओं पर खड़ा किया गया।
ना CCTV है,
ना भरोसेमंद गवाह,
ना वैज्ञानिक एविडेंस,
ना ईमानदार जांच।
कोर्ट ने दोनों फांसी की सजाएं रद्द कर दीं और कहा —
अगर आरोपी पर कोई और केस नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
48 घंटे के भीतर दशनाथ जेल से बाहर आ जाता है।
आठ साल बाद।
अब सबसे बड़े सवाल खड़े हैं —
अगर वह बेगुनाह था, तो आठ साल जेल का जिम्मेदार कौन?
और अगर वह बेगुनाह नहीं था, तो उस सात साल की बच्ची का कातिल कौन?
आज भी किसी के पास जवाब नहीं है।
बच्ची के पिता ने बस इतना कहा —
“हम बस यह जानना चाहते थे कि हमारी बेटी के साथ यह किसने किया।”
यही इस कहानी की सबसे बड़ी त्रासदी है।