एक अंधेरा बेसमेंट, दो तख्त, पाँच साल की खामोशी — जहाँ एक बेटी जिंदा कंकाल बन गई और बाप ने दम तोड़ दिया।
31 दिसंबर की रात थी।
साल खत्म होने वाला था।
हर तरफ नए साल की बातें, खुशियाँ, उम्मीदें…
लेकिन उसी रात एक ऐसी सच्चाई सामने आई,
जिसने इंसान होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
उत्तर प्रदेश के महोबा में एक घर था।
बिलकुल आम-सा घर।
ना कोई चीख, ना कोई शोर।
लेकिन उस घर के नीचे…
एक अंधेरा था — और उस अंधेरे में दो ज़िंदगियाँ।
70 साल के ओम प्रकाश।
और उनकी 27 साल की बेटी रश्मि।
पाँच साल।
पूरे पाँच साल…
ये दोनों एक बेसमेंट में बंद रहे।
कोई खिड़की नहीं।
कोई रोशनी नहीं।
कोई आवाज़ बाहर तक नहीं।
रश्मि जब वहाँ गई थी,
तब उसकी उम्र 22 साल थी।
एक ज़िंदा, सांस लेती लड़की।
पाँच साल बाद जब कंबल हटाया गया,
तो वो लड़की नहीं थी…
बस हड्डियों का ढांचा था।
लेकिन आँखें खुली थीं।
जिंदा थीं।
बाप पास वाले तख्त पर पड़ा था।
वो नहीं उठा।
वो जा चुका था।
ये किसी जेल की कहानी नहीं थी।
ये किसी दुश्मन की साजिश नहीं थी।
ये सब किया था
उन्हीं लोगों ने
जिन्हें घर की देखभाल के लिए रखा गया था।
लालच ने इंसानियत खा ली।
घर, पैसा, संपत्ति…
बस इसी लालच में
बाप-बेटी को दुनिया से काट दिया गया।
रिश्तेदार आते रहे।
पूछते रहे।
हर बार जवाब मिला —
“घर पर नहीं हैं।”
“मिलना नहीं चाहते।”
धीरे-धीरे लोग मान गए।
किसी ने ज़ोर नहीं दिया।
किसी ने दरवाज़ा नहीं तोड़ा।
और उधर…
हर दिन भूख थी।
हर दिन प्यास थी।
हर दिन मौत थोड़ी और करीब आती रही।
सबसे डरावनी बात क्या है?
ये सब पाँच साल चला —
और किसी को पता ही नहीं चला।
इस कहानी का मतलब डराना नहीं है।
इसका मतलब है जगाना।
अगर आपका कोई अपना
बहुत दिनों से चुप है…
फोन नहीं उठा रहा…
दिख नहीं रहा…
तो एक बार हाल पूछ लीजिए।
हो सकता है
आपकी एक कोशिश
किसी की पूरी ज़िंदगी बचा ले।
नया साल आ रहा है।
संकल्प यही रखिए —
कहानियाँ सिर्फ सुनने तक रहें,
ज़िंदगी में दोहराई न जाएँ।
🙏
इंसान बने रहिए।