ढाका में जारी हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा आगजनी
अगर कोई यह सोचे कि बांग्लादेश में जो कुछ बीती रात हुआ, वो अचानक भड़का गुस्सा है, तो शायद वो तस्वीर का आधा हिस्सा ही देख रहा है।
ढाका, चटगांव और दूसरे शहरों में जो आग लगी, वो सिर्फ सड़कों पर नहीं थी — वो सिस्टम के अंदर भी फैल चुकी है।
रात भर प्रदर्शन चलते रहे। तोड़फोड़ हुई। आगजनी हुई। और सबसे डराने वाली बात ये रही कि हालात को काबू में करने वाला कोई साफ़ चेहरा नज़र नहीं आया।
सबसे पहले निशाना मीडिया क्यों बनी?
ढाका में जिन जगहों पर हमला हुआ, उनमें देश के बड़े अख़बार सबसे आगे थे।
प्रोथम आलोक के दफ्तर में तोड़फोड़ हुई और डेली स्टार की इमारत जला दी गई।
ये कोई इत्तेफ़ाक नहीं लगता। जब भी हालात बिगड़ते हैं, सबसे पहले वही आवाज़ें दबाई जाती हैं जो सवाल पूछती हैं।
अगर खबरें ही नहीं रहेंगी, तो सच कौन बताएगा?
भारतीय मिशन तक आग क्यों पहुंची?
चटगांव में भारतीय उच्च आयोग से जुड़े अधिकारियों पर हमला होना इस बात का इशारा है कि हिंसा अब सिर्फ अंदरूनी मामला नहीं रही।
असिस्टेंट हाई कमिश्नर के घर पर हमला, डॉ. राजीव रंजन के आवास पर पथराव — ये सब किसी गुस्साई भीड़ की अचानक की गई हरकत नहीं लगती।
ऐसे हमले अक्सर संदेश देने के लिए किए जाते हैं, डर पैदा करने के लिए।
जब हिंसा का रुख धर्म की तरफ मुड़ जाए
मैमनसिंह के भालुका इलाके में हिंदू वर्कर दीपु चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या एक बहुत ही खतरनाक मोड़ दिखाती है।
यहां मामला राजनीति से निकलकर इंसानियत पर आ गया।
जब सिस्टम कमजोर होता है, तो सबसे पहले वही लोग मारे जाते हैं जो सबसे कमज़ोर होते हैं।
इस हत्या ने साफ़ कर दिया कि हालात हाथ से फिसल चुके हैं।
नेताओं के घर जलना क्या बताता है?
ढाका में पूर्व शिक्षा मंत्री और आवामी लीग नेता मोहबुल हसन चौधरी के घर को आग के हवाले कर दिया गया।
यह सिर्फ एक नेता का घर नहीं था — यह एक चेतावनी थी।
ऐसा लगता है जैसे किसी ने तय कर लिया हो कि आवामी लीग से जुड़े हर चेहरे को मिटा देना है।
घर, दफ्तर, पहचान — सब कुछ।
सरकार और सेना कहां खड़ी है?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
इतनी हिंसा के बाद भी यूनुस सरकार सिर्फ अपील करती दिखी।
ना सख्ती, ना ठोस कार्रवाई।
और सेना?
वो बस देखती रही।
जब भीड़ आग लगा रही थी, तब सेना का मूकदर्शक बने रहना बहुत कुछ कहता है।
या तो सरकार बेबस है, या फिर हालात को जानबूझकर बहने दिया जा रहा है।
ये हालात किस तरफ ले जा रहे हैं?
ढाका की सड़कों पर जो भीड़ दिख रही है, वो सिर्फ आज की तस्वीर नहीं है।
ये आने वाले दिनों की चेतावनी है।
चार शहरों तक फैल चुकी हिंसा अगर अभी नहीं रुकी, तो बांग्लादेश सिर्फ अशांति नहीं देखेगा —
वो एक लंबे राजनीतिक अंधेरे में जा सकता है।
आज सवाल सिर्फ ये नहीं है कि आग किसने लगाई।
सवाल ये है कि आग बुझाने वाला क्यों गायब है।