करवा चौथ की रात, गुरुग्राम की सोसाइटी में हुआ सनसनीखेज मर्डर
मैं अक्सर कहता हूं—इस दुनिया में कोई रिश्ता ऐसा नहीं, जिसके साथ कभी न कभी जुर्म न जुड़ा हो। फर्क बस इतना है कि कुछ रिश्तों में जुर्म दबा रह जाता है और कुछ में वही जुर्म एक दिन खून बनकर बाहर आ जाता है।
लोग प्यार को पाक बताते हैं, कुर्बानी की मिसालें देते हैं… लेकिन जब वही प्यार स्वार्थी हो जाए, तो इंसान सामने वाले की जान लेने से भी नहीं हिचकता।
आज की कहानी बिल्कुल ऐसी ही है।
एक ऐसी मोहब्बत, जो शादी से बाहर पैदा हुई…
एक ऐसा रिश्ता, जो धीरे-धीरे ज़हर बनता चला गया…
और फिर एक रात, आठवीं मंज़िल से गिरती एक औरत के साथ, सब कुछ खत्म हो गया।
साल था 2015।
दिल्ली से सटा इलाका—गुरुग्राम-फरीदाबाद रोड।
एक पॉश हाउसिंग सोसाइटी, जहां बाहर से सब कुछ बेहद खूबसूरत दिखता था। लेकिन इसी सोसाइटी के अंदर एक कहानी पल रही थी, जिसे अंजाम तक पहुंचने में तीन साल लगे।
यहीं रहती थी शिफाली।
फ्रीलांस जर्नलिस्ट। पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर। कॉलेज के दिनों में प्यार हुआ, उसी प्यार से शादी भी हुई। ज़िंदगी सामान्य थी—कोई बड़ी शिकायत नहीं, कोई बड़ा झगड़ा नहीं।
शादी के बाद शिफाली और उसके पति ने अपना एक फ्लैट बेचने का फैसला किया।
फ्लैट खरीदा एक शख्स ने—विक्रम।
विक्रम भी शादीशुदा था। पत्नी दीपिका, बैंक में नौकरी, दो छोटे बच्चे—एक बेटी और एक छह महीने का बेटा।
इत्तेफाक देखिए…
फ्लैट बिकने के बाद भी शिफाली उसी सोसाइटी में रहती रही।
और विक्रम भी उसी सोसाइटी में आकर बस गया।
सुबह की मॉर्निंग वॉक…
लिफ्ट में छोटी-छोटी बातें…
सोसाइटी के फंक्शन…
और फिर वही पुरानी कहानी—पहले दोस्ती, फिर अपनापन, और फिर एक दिन एहसास कि दोस्ती अब दोस्ती नहीं रही।
प्यार हो गया था।
लेकिन यह प्यार पहले से बने दो घरों के बीच खड़ा था।
शुरू में किसी ने कुछ नहीं कहा।
शिफाली का पति सब समझता था, पर चुप रहा।
दीपिका भी महसूस कर रही थी कि उसका पति बदल रहा है, मगर वो अपने बच्चों के लिए रिश्ते को बचाए रखना चाहती थी।
वक़्त बीतता गया।
विक्रम और शिफाली का रिश्ता गहराता गया।
घूमने जाना, होटल, ट्रिप्स—सब कुछ होने लगा।
एक दिन शिफाली ने सवाल कर दिया—
“हम ऐसे कब तक रहेंगे?”
विक्रम के दिल में भी वही सवाल था।
फैसला हुआ—तलाक।
शिफाली ने अपने पति से साफ-साफ बात की।
उसने रोका नहीं।
उसने कहा—अगर तुम खुश नहीं हो, तो रिश्ता बोझ नहीं बनना चाहिए।
एक घर टूट गया… शांति से।
अब दूसरी तरफ लड़ाई शुरू हुई।
जब विक्रम ने दीपिका से तलाक की बात की, तो दीपिका की दुनिया हिल गई।
उसने बच्चों की दुहाई दी, परिवार को जोड़ा, माता-पिता को बुलाया…
लेकिन विक्रम नहीं माना।
आखिरकार दीपिका ने कह दिया—
“मैं तलाक नहीं दूंगी। जो करना है कर लो।”
यहीं से मोहब्बत ने जुर्म का रास्ता चुन लिया।
शिफाली ने बताया कि वह गर्भवती है—छह महीने।
अब इंतज़ार नामुमकिन था।
विक्रम पर दबाव बढ़ने लगा।
दोनों लद्दाख गए।
बर्फीली वादियां, ऊंचे पहाड़…
और इन्हीं पहाड़ों के बीच पहली बार मौत को लेकर खुलकर बात हुई।
योजना बनी—
दीपिका को किसी पहाड़ी जगह ले जाओ, धक्का दे दो, और सब कुछ एक्सीडेंट लगे।
नैनीताल में कोशिश की गई।
लेकिन दीपिका पहाड़ों पर जाने से बार-बार मना करती रही।
प्लान फेल हो गया।
वापसी में शिफाली का गुस्सा फूट पड़ा।
मैसेज आया—
“तुमसे एक काम भी नहीं हुआ। तुम लूज़र हो।”
27 अक्टूबर 2018।
करवा चौथ।
जिस दिन एक पत्नी अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है, उसी रात उसकी ज़िंदगी छीन ली गई।
घर में बहस हुई।
मैसेज, फोन, उकसावे—सब एक साथ।
आठवीं मंज़िल की बालकनी।
बहस ने धक्का बना लिया।
दीपिका गिरने लगी…
हाथ पकड़कर आखिरी बार बोली—
“मेरे बच्चे हैं… मुझे मत मारो।”
लेकिन मोहब्बत अंधी हो चुकी थी।
हाथ छूट गया।
नीचे गिरते ही सब खत्म।
शुरू में एक्सीडेंट बताया गया।
लेकिन मोबाइल चैट्स, मैसेज और एक पड़ोसी की गवाही ने सच सामने ला दिया।
दो दिन में विक्रम गिरफ्तार हुआ।
शिफाली भी जेल पहुंची।
कुछ समय बाद शिफाली को गर्भवती होने के आधार पर जमानत मिल गई।
और दीपिका के बच्चे…
उनकी मां हमेशा के लिए एक फाइल नंबर बन गई।
यही फर्क होता है प्यार और जुनून में।
प्यार छोड़ना सिखाता है।
जुनून मार डालता है।
आज की कहानी यहीं खत्म होती है।