भारतीय टी20 टीम का एक्शन मोमेंट (फाइल फोटो)
यशस्वी जायसवाल का नाम वर्ल्ड कप की लिस्ट में नहीं था और यहीं से बहस शुरू हो गई। सवाल वही पुराना—जब लड़का रन बना रहा है, मेहनत कर रहा है, बड़े मैचों में टिक रहा है, तो फिर बाहर क्यों? जवाब आसान नहीं है, लेकिन सीधा है।
क्रिकेट अब सिर्फ फॉर्म का खेल नहीं रहा। यह गणित, संतुलन और ज़रूरतों का खेल हो चुका है। इस बार सेलेक्टर्स ने खिलाड़ियों को उनकी काबिलियत से ज़्यादा, उनकी उपयोगिता से तौला।
टीम मैनेजमेंट ने पहले ही तय कर लिया था कि विकेटकीपर फिनिशर की भूमिका में नहीं होगा। विकेटकीपर ऊपर खेलेगा ताकि बैटिंग गहराई अपने आप बन जाए। इसी सोच के साथ टीम में सिर्फ दो विकेटकीपर रखने का फैसला लिया गया। यही फैसला यशस्वी के रास्ते में सबसे बड़ी दीवार बना।
ओपनिंग की तस्वीर भी लगभग साफ थी। एक तरफ Abhishek Sharma, जो मैदान पर उतरते ही मैच की गति बदल देता है। तेज़ स्ट्राइक रेट, बेखौफ अंदाज़ और ऊपर से थोड़ी बहुत गेंदबाज़ी। दूसरी तरफ Sanju Samson, जो ओपनिंग के साथ विकेटकीपिंग भी करता है। जब दो कुर्सियाँ पहले से भरी हों, तो तीसरे के लिए जगह बनाना मुश्किल हो जाता है।
यहीं से चयन का रुख Ishan Kishan की तरफ मुड़ता है। ईशान ने घरेलू क्रिकेट में रन भी बनाए थे और कप्तानी की जिम्मेदारी भी संभाली थी। सबसे बड़ी बात, वो ओपनिंग भी कर सकता है और विकेटकीपिंग भी। यानी एक खिलाड़ी, दो विकल्प। सेलेक्टर्स के लिए यही सौदा सबसे फायदेमंद था।
इसका मतलब यह नहीं कि यशस्वी की दावेदारी कमज़ोर थी। IPL में लगातार अच्छे रन, इंटरनेशनल टी20 में शतक और घरेलू टूर्नामेंट में शानदार पारियाँ—ये सब उसके नाम के साथ हैं। लेकिन चयन के समय सवाल यह नहीं था कि कौन बेहतर बल्लेबाज़ है, सवाल यह था कि कौन टीम को ज़्यादा संतुलन देता है।
फिनिशिंग की बात करें तो वहाँ मुकाबला अलग था। Rinku Singh को इसलिए चुना गया क्योंकि आख़िरी ओवरों में मैच पलटने की उसकी क्षमता किसी और जैसी नहीं है। उस जगह पर यशस्वी का नाम कभी चर्चा में था ही नहीं।
असल सच्चाई यह है कि यशस्वी की सीधी टक्कर किसी विकेटकीपर या मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज़ से नहीं, बल्कि अभिषेक शर्मा से है। जब तक अभिषेक उसी आक्रामकता और निरंतरता से खेलता रहेगा, यशस्वी के लिए दरवाज़ा खुलना मुश्किल रहेगा।
आगे का रास्ता बंद नहीं है, लेकिन आसान भी नहीं। क्रिकेट में हालात जल्दी बदलते हैं। एक IPL सीज़न, कुछ बड़ी पारियाँ और सेलेक्टर्स की सोच फिर से घूम सकती है। टेस्ट क्रिकेट में यशस्वी की जगह पक्की मानी जा रही है, सीमित ओवरों में उसे थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ सकता है।
फिलहाल यह कहना ज़्यादा सही होगा कि यशस्वी जायसवाल बाहर इसलिए नहीं हैं क्योंकि वो पीछे रह गए हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि टीम ने इस समय किसी और रास्ते को चुना है। क्रिकेट में कई बार मेहनत से ज़्यादा, वक़्त का सही होना मायने रखता है।