अरावली बचेगी, तो देश बचेगा
अगर कोई आपसे कहे कि इंसान कहलाने के लिए 6 फीट लंबा होना ज़रूरी है, तो आपको यह बात बेहूदी लगेगी। लेकिन आज भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली पर्वतमाला के साथ बिल्कुल यही तर्क लागू किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जो पहाड़ी आसपास की ज़मीन से 100 मीटर ऊँची नहीं है, वह अरावली नहीं मानी जाएगी। मतलब सुरक्षा खत्म, जंगल खत्म और माइनिंग के दरवाज़े खुले।
अरावली सिर्फ पहाड़ों की एक लाइन नहीं है। यह भारत की सबसे पुरानी प्राकृतिक ढाल है, जो गुजरात से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली की रायसीना हिल्स तक जाती है। राष्ट्रपति भवन, जेएनयू, जयपुर के आमेर–नाहरगढ़–जयगढ़ किले और चित्तौड़गढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थल इसी सिस्टम का हिस्सा हैं। माउंट आबू का गुरु शिखर इसकी सबसे ऊँची चोटी है। करोड़ों साल पहले यह पहाड़ बहुत ऊँचे थे, लेकिन हवा और बारिश ने इन्हें धीरे-धीरे घिस दिया। यही वजह है कि आज इनकी ऊँचाई कम है, पर महत्व कम नहीं हुआ।
समस्या तब शुरू हुई जब अरावली की एक नई परिभाषा को स्वीकार किया गया। इस परिभाषा के अनुसार, अगर कोई पहाड़ी अपने आसपास की ज़मीन से 100 मीटर ऊँची नहीं है, तो उसे अरावली नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि अगर दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से ज़्यादा का फासला है, तो वे एक ही रेंज का हिस्सा नहीं होंगी। इसका सीधा नतीजा यह है कि अरावली की 90 प्रतिशत से ज़्यादा पहाड़ियां कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएंगी।
Forest Survey of India के आंकड़े बताते हैं कि अरावली की कुल 1281 पहाड़ियों में से केवल करीब 1000 के आसपास ही इस 100 मीटर वाले नियम में आती हैं। बाकी सारी पहाड़ियां, जो प्राकृतिक रूप से छोटी हो चुकी हैं, सीधे खतरे में हैं। जैसे ही किसी पहाड़ी से “अरावली” का टैग हटेगा, वहां Forest Conservation Act लागू नहीं होगा और माइनिंग व कंस्ट्रक्शन का रास्ता साफ हो जाएगा।
इस पूरे नियम में सबसे खतरनाक शब्द है “आसपास की ज़मीन”। विज्ञान में ऊँचाई हमेशा समुद्र तल से नापी जाती है, ताकि कोई गड़बड़ी न हो। लेकिन यहां ऊँचाई नापने का आधार “surrounding land” रखा गया है, जिसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। कौन-सी ज़मीन? कितनी दूर की ज़मीन? अगर कोई आसपास की ज़मीन को ही ऊँचा कर दे, तो पहाड़ी अपने आप छोटी हो जाएगी और 100 मीटर से नीचे आते ही उसकी सुरक्षा खत्म।
अगर अरावली की 90 प्रतिशत पहाड़ियां कट गईं, तो इसका असर सिर्फ पेड़ों या पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। सबसे बड़ा खतरा थार रेगिस्तान का है। थार सिर्फ रेत का ढेर नहीं है, वह एक हालत है जो फैलती है। पश्चिमी हवाएं लाखों टन बारीक रेत उड़ाकर लाती हैं। अरावली आज एक दीवार की तरह इस रेत को रोकती है। अगर यह दीवार टूट गई, तो राजस्थान की रेत सीधे गुरुग्राम, फरीदाबाद, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुंचेगी। खेतों पर रेत जमेगी, उपज घटेगी और आने वाले दशकों में दिल्ली का मौसम जैसलमेर जैसा सूखा हो सकता है।
दूसरा बड़ा नुकसान वाइल्डलाइफ का होगा। अरावली गुजरात से दिल्ली तक जानवरों के आने-जाने का एक प्राकृतिक कॉरिडोर है। Ranthambore National Park और Sariska Tiger Reserve जैसे जंगल इसी कॉरिडोर से जुड़े हैं। अगर पहाड़ियां कट गईं, तो यह रास्ता टूट जाएगा। जानवर एक ही इलाके में फंस जाएंगे, जिससे इनब्रीडिंग बढ़ेगी। इसका मतलब कमजोर इम्यूनिटी, बीमारी से सामूहिक मौत और धीरे-धीरे प्रजातियों का खत्म होना।
पानी के लिहाज़ से भी अरावली बेहद ज़रूरी है। पहाड़ स्पंज की तरह बारिश के पानी को सोखते हैं और धीरे-धीरे ज़मीन के नीचे भेजते हैं, जिससे भूजल रिचार्ज होता है। लेकिन जब पहाड़ काटकर वहां कंक्रीट की सिटी बनती है, तो पानी ज़मीन में जाता ही नहीं। नतीजा होता है एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ सूखा। यही वजह है कि अरावली के कटने से दिल्ली-एनसीआर में वाटर क्राइसिस और गंभीर होगा।
प्रदूषण का मुद्दा भी इससे जुड़ा है। अरावली के जंगल हवा में मौजूद धूल और PM पार्टिकल्स को पकड़ लेते हैं। अगर जंगल हटे और उनकी जगह कंक्रीट आई, तो धूल हवा में ही घूमती रहेगी और सीधा हमारे फेफड़ों में जाएगी। ऊपर से थार की रेत बिना रुकावट NCR में घुसेगी, जिससे एयर क्वालिटी और खराब होगी।
यह सब नया नहीं है। 1980 और 1990 के दशक में रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन बूम के दौरान हरियाणा और राजस्थान में बड़े पैमाने पर अवैध माइनिंग हुई। कई जगह पूरे के पूरे पहाड़ गायब कर दिए गए। तब मामला Supreme Court of India तक पहुंचा। कोर्ट ने कई बार बैन लगाया, कॉलोनियां तुड़वाईं और अरावली को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया माना। लेकिन हर बार कोई न कोई नया रास्ता निकाल लिया गया।
अब कहा जा रहा है कि जब तक Sustainable Mining का एक प्लान तैयार नहीं हो जाता, तब तक नई माइनिंग लीज़ नहीं दी जाएंगी। डर यह है कि इतिहास फिर से दोहराया जाएगा—पहले सख्त नियम बनेंगे और बाद में धीरे-धीरे उन्हें ढीला कर दिया जाएगा।
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं है। यह हवा, पानी, जंगल, जानवर और इंसान—सबका साझा सिस्टम है। इमारतें दोबारा बन सकती हैं, सड़कें फिर से डल सकती हैं, लेकिन 250 करोड़ साल पुरानी यह पर्वतमाला अगर एक बार काट दी गई, तो दुनिया की कोई भी तकनीक इसे वापस नहीं ला सकती। यह नुकसान हमेशा के लिए होगा, और उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।