बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बीच तनावपूर्ण माहौल
बांग्लादेश से एक बार फिर दिल दहला देने वाली और अत्यंत चिंताजनक खबर सामने आई है। हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। पहले दीपपू चंद्र दास और अब 29 वर्षीय अमृत मंडल की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या—दोनों घटनाएं एक ही भयावह पैटर्न की ओर इशारा करती हैं।
राजबाड़ी में अमृत मंडल की हत्या
बांग्लादेश के राजबाड़ी जिला में बीती रात करीब 11 बजे अमृत मंडल को स्थानीय भीड़ ने बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला। बांग्लादेश पुलिस का दावा है कि उस पर “जबरन वसूली” का आरोप लगाया गया था। लेकिन सवाल यह है कि किसी भी आरोप की सच्चाई तय करने का अधिकार भीड़ को किसने दिया? क्या कानून व्यवस्था का काम अब सड़क पर खड़ी भीड़ करेगी?
दीपपू चंद्र दास की घटना: इंसानियत पर धब्बा
इससे ठीक एक हफ्ते पहले, 18 दिसंबर को 27 वर्षीय दीपपू चंद्र दास को “इस्लाम के अपमान” के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। हत्या के बाद उसकी लाश को बीच चौराहे पर आग के हवाले कर दिया गया—यह घटना न सिर्फ हिंसा, बल्कि खुलेआम नफरत की भयावह मिसाल थी। इस मामले में पुलिस ने 18 लोगों की गिरफ्तारी का दावा किया है, लेकिन क्या इससे जमीन पर डर का माहौल कम हुआ?
चटगांव में हिंदू परिवारों पर हमला
23 दिसंबर को चटगांव में दो हिंदू परिवारों के घरों पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। नौ लोगों को जिंदा जलाने की कोशिश की गई। हैरानी की बात यह है कि हमलावरों की पहचान अब तक नहीं हो पाई, और पुलिस ने बाद में इनाम की घोषणा कर औपचारिकता निभा दी।
आरोप पहले, इंसाफ बाद में—या कभी नहीं?
इन घटनाओं में एक बात समान है—
- पहले झूठे या अप्रमाणित आरोप लगाए जाते हैं।
- फिर भीड़ न्यायाधीश बन जाती है।
- हत्या के बाद कानून की कार्रवाई ढीली और दिखावटी नजर आती है।
बार-बार ऐसा लगता है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी भीड़ का कानून चल रहा है, न कि संविधान और न्याय का।
सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल
बांग्लादेश सरकार और पुलिस हर बार यह संदेश देने की कोशिश करती हैं कि वे “कार्रवाई कर रहे हैं”—कहीं कुछ गिरफ्तारियां, कहीं इनाम की घोषणा। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार रुक नहीं रहे। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि
- क्या सरकार वास्तव में गंभीर है?
- या ये कदम सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए उठाए जा रहे हैं?
निष्कर्ष
आज बांग्लादेश में हिंदू समुदाय लगातार डर और असुरक्षा के साए में जी रहा है। अमृत मंडल और दीपपू चंद्र दास जैसे नाम सिर्फ आंकड़े नहीं हैं—वे उस सिस्टम की विफलता का प्रतीक हैं, जहां अल्पसंख्यकों की जान की कीमत बेहद कम हो गई है।
यह सिर्फ बांग्लादेश का आंतरिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि मानवाधिकार और इंसानियत का गंभीर सवाल बन चुका है। अगर समय रहते ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह हिंसा और गहराती जाएगी—और इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि मौन खड़ी व्यवस्था भी होगी।