बैटल ऑफ गलवान पर बनी फिल्म के ट्रेलर में दिखा सलमान खान का आर्मी लुक, जिस पर चीन के सरकारी मीडिया ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
जिस तरह धुरंधर ने पाकिस्तान के टीवी स्टूडियो में बेचैनी पैदा कर दी थी, ठीक उसी तरह बैटल ऑफ गलवान के ट्रेलर ने चीन की नींद उड़ा दी है। फर्क बस इतना है कि तब घबराहट कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में दिखी थी, और अब वही बेचैनी बीजिंग तक पहुंच गई है। एलओसी से एलएसी—आग वही है, जलन वही है।
चीन नाराज़ क्यों है?
हैरानी इस बात की नहीं कि चीन नाराज़ है—हैरानी इस बात की है कि वह नाराज़ किस बात पर है।
ट्रेलर आने के बाद चीन के सरकारी मीडिया, खासकर Global Times ने प्रतिक्रिया दी। लेकिन बहस गलवान की सच्चाई पर नहीं, बल्कि अभिनेता के लुक, हेयरस्टाइल और वर्दी तक सिमट गई।
जब मुद्दे से हटकर हेयरस्टाइल पर बहस हो, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं सच चुभ रहा है।
असल परेशानी फिल्म नहीं, तारीख है
असल दर्द किसी फिल्म से नहीं, बल्कि उस तारीख से है—15 जून 2020।
वही रात, जब गलवान घाटी में बिना गोलियों के, अंधेरे में, ऊंचाई पर, बर्फीली नदी के किनारे हाथों-हाथों की भीषण झड़प हुई।
- भारत के 20 जवान शहीद हुए
- वीर कर्नल बी. संतोष बाबू शहीद हुए
- 1967 के बाद पहली बार भारत-चीन झड़प में जानें गईं
यह कोई फिल्मी सेट नहीं था। न डायलॉग, न बैकग्राउंड म्यूज़िक—सिर्फ फौजी, लाठी-डंडे, नुकीले हथियार और बर्फीली रात।
चीन का विरोधाभास
चीन पहले कहता रहा—“कुछ नहीं हुआ।”
फिर महीनों बाद माना—“कुछ लोग मरे।”
लेकिन कितने, कौन, किस रैंक के—कभी साफ नहीं बताया।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और रिसर्च में अलग तस्वीर सामने आई:
- कुछ स्वतंत्र आकलनों में 38–40 चीनी सैनिकों के मारे जाने की बात
- कुछ दावों में संख्या 60 तक
- चीनी सोशल मीडिया पर आई पोस्ट्स बाद में हटा दी गईं
यही वजह है कि ट्रेलर आते ही बहस तेज हो गई—क्योंकि कहानी सामने आने से दबी सच्चाई उजागर हो सकती है।
फिल्म और फैक्ट
हां, यह सही है कि फिल्में सीमाएं नहीं बदलतीं।
लेकिन वे उन फैक्ट्स को सामने जरूर लाती हैं, जिन्हें दबाने की कोशिश की जाती है।
गलवान के बाद:
- भारत ने चीनी ऐप्स बैन किए
- एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर और सैन्य तैनाती बढ़ाई
- कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक स्तर पर सख्त रुख अपनाया
यह सब किसी फिल्म की वजह से नहीं, बल्कि उस रात की वजह से हुआ—जिसे भारत भूलना नहीं चाहता और चीन भूल जाना चाहता है।
तो सवाल वही…
क्या बैटल ऑफ गलवान, चीन के लिए वही बन गई है जो धुरंधर पाकिस्तान के लिए थी?
जब
- एक ट्रेलर पर सरकारी मीडिया सक्रिय हो जाए
- बहस मुद्दे से हटकर हेयरस्टाइल तक पहुंच जाए
- बार-बार कहा जाए कि “फिल्में फैक्ट नहीं बदलतीं”
तो साफ है—डर फिल्म से नहीं, उस सच से है जो दुनिया के सामने आ सकता है।
सीमा नहीं बदलेगी।
इतिहास नहीं बदलेगा।
लेकिन सच्चाई सामने आ जाएगी—और शायद यही बात चीन को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
भारत शांत है, लेकिन सतर्क है—एलएसी पर भी, एलओसी पर भी।