चोमू में मस्जिद के बाहर पत्थर हटाने के दौरान भारी पुलिस तैनाती, तनाव के बाद हालात काबू में
कोई मामला नहीं है साहब… हमें क्यों पकड़ा गया, हमें कुछ नहीं पता।
हम तो परदेसी हैं… किराए से रहते हैं… चूड़ियाँ बेचते हैं…”
ये शब्द उस शख़्स के हैं, जिसे पुलिस हिरासत में लिया गया।
लेकिन सवाल ये है—अगर कोई मामला नहीं था, तो पत्थर क्यों उड़े?
जब सहमति बनी थी, तो बवाल क्यों हुआ?
मामला है चोमू का—
जयपुर से सटे इस कस्बे में एक छोटी सी मस्जिद के बाहर
सड़क पर पड़े भारी पत्थर लंबे समय से ट्रैफिक में बाधा बन रहे थे।
- दोनों पक्षों में आपसी सहमति बनी
- प्रशासन की मौजूदगी में पत्थर हटाने का फैसला हुआ
- गुरुवार, 25 दिसंबर (क्रिसमस की रात) काम शुरू भी हो गया
लोग खुश थे—
“चलो, रास्ता खुलेगा… झंझट खत्म होगा…”
लेकिन तभी—
अंधेरे में उतरी भीड़, हाथों में पत्थर
काम चल ही रहा था कि
अचानक भीड़ उमड़ी,
और बिना चेतावनी—
- मजदूरों पर हमला
- पुलिस पर पत्थरबाज़ी
- तंग गलियों से लगातार पथराव
ये कोई अचानक गुस्सा नहीं था,
बल्कि सोची-समझी अराजकता थी।
पुलिस पर हमला, जवाब में आंसू गैस और लाठीचार्ज
स्थिति बिगड़ते देख पुलिस को:
- आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े
- हालात काबू में करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा
कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
रात भर इलाका दहलता रहा।
सुबह होते ही बदला मंजर
शुक्रवार की सुबह चोमू का नज़ारा बदला हुआ था—
- राजस्थान पुलिस
- एसटीएफ
- दंगा नियंत्रण वाहन
- हर संवेदनशील मोड़ पर भारी जाप्ता
मस्जिद से कुछ ही मीटर की दूरी पर
सैकड़ों जवान तैनात थे।
60 से ज़्यादा हिरासत में, महिलाएं भी शामिल
अब तक:
- 60 से ज्यादा लोगों को राउंड-अप किया गया
- कुछ महिलाएं भी हिरासत में
- कई पहले से उपद्रवी रिकॉर्ड वाले
पुलिस का साफ कहना है—
“जो दोषी हैं, उन्हें चिन्हित कर गिरफ्तार किया जाएगा।
किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”
सवाल जो अब भी खड़े हैं
- जब हाईकोर्ट का स्टे था,
तो अवैध कब्जे की कोशिश क्यों हुई? - सहमति के बाद भी
पत्थरबाज़ी की ज़रूरत क्यों पड़ी? - क्या हर अतिक्रमण
मजहबी टकराव में बदलेगा?
पत्थर सिर्फ हाथों में नहीं, सोच में भी थे
ये पत्थर सिर्फ सड़क पर नहीं थे,
ये मानसिकता में जमे हुए थे।
कल तक जिसे
कश्मीर की तस्वीर माना जाता था,
वही तस्वीर अब
राजस्थान में भी दिखने लगी।
फिलहाल शांति, लेकिन चेतावनी साफ है
अभी हालात काबू में हैं।
फ्लैग मार्च हो चुका है।
इलाका छावनी में तब्दील है।
लेकिन प्रशासन का संदेश साफ है—
“कानून से ऊपर कोई नहीं।
पत्थरबाज़ी का जवाब अब सख्ती से मिलेगा।”
निष्कर्ष
चोमू की ये घटना सिर्फ पत्थरों की नहीं,
बल्कि उस सोच की है
जो कानून, सहमति और इंसानियत—
तीनों को कुचल देती है।