यह AI द्वारा बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर है, जो दीपू चंद्र दास की दर्दनाक घटना को दर्शाती है।
17 दिसंबर 2025 की दोपहर थी।
करीब 12:30 बजे का वक्त। केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टापल्लम इलाके में एक आदमी भटकता हुआ दिख रहा था। नाम था राम नारायण बघेल, उम्र 31 साल। वह कोई अपराधी नहीं था, न ही किसी की निगाह में खतरा। वह सिर्फ एक मजदूर था, जो अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर रोज़गार की तलाश में आया था।
उसे रास्ता समझ नहीं आ रहा था। भाषा अलग थी, लोग अलग थे। पास में कुछ महिलाएं काम कर रही थीं। उन्होंने उसे देखा, घबराईं और अचानक शोर मच गया। शोर सुनते ही आसपास के लोग इकट्ठा होने लगे। सवाल शुरू हुए—“कौन हो?”, “कहां से आए हो?” लेकिन डर और भाषा की दीवार ने उसकी जुबान बांध दी। वह ठीक से जवाब नहीं दे पाया।
इसी बीच किसी ने पूछा—“क्या तुम बांग्लादेशी हो?”
शायद उसे लगा कि हां कह देने से बात खत्म हो जाएगी। उसने सिर हिलाया।
बस… यही उसकी आखिरी गलती थी।
मोबाइल निकल आए। वीडियो बनने लगे। भीड़ का मिज़ाज बदल गया। किसी ने डंडा उठाया, किसी ने लात मारी। कोई चिल्ला रहा था, कोई तमाशा देख रहा था। भीड़ तब तक नहीं रुकी, जब तक राम नारायण की सांसें नहीं थम गईं। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा गया कि उसके शरीर का कोई ऐसा हिस्सा नहीं था जहां चोट न हो।
उसकी जेब से एक पर्ची मिली। उस पर एक फोन नंबर लिखा था—“इस नंबर पर बात कर लेना।”
पुलिस ने फोन किया। कॉल करीब 2000 किलोमीटर दूर झारखंड के एक गांव में लगी। उधर से एक महिला ने फोन उठाया—“मैं ललिता बोल रही हूं… ये मेरे पति राम नारायण हैं। मजदूरी के लिए केरल गए थे।”
उस पल पुलिस भी खामोश हो गई। एक मजदूर, दो छोटे बच्चे, बूढ़े माता-पिता और घर का इकलौता कमाने वाला… सब खत्म। बाद में पांच लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन जो जान चली गई, वह वापस नहीं आ सकी।
अगले ही दिन, 18 दिसंबर 2025।
कहानी की जगह बदलती है, देश बदलता है, लेकिन इंसान की कीमत वही रहती है।
बांग्लादेश के मेमन सिंह जिले में एक कपड़ा फैक्ट्री। शाम करीब 5 बजे का वक्त। फैक्ट्री के अंदर 27 साल का सुपरवाइज़र दीपू चंद्र दास काम कर रहा था। अचानक लोग उसे अजीब नजरों से देखने लगे। फुसफुसाहटें शुरू हुईं। एक अफवाह फैल गई—कि उसने पैगंबर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है।
दीपू हैरान था। वह पूछ रहा था—“मैंने क्या कहा? मैंने कुछ नहीं किया।”
लेकिन अफवाह सच्चाई से तेज दौड़ रही थी।
फैक्ट्री का काम रुक गया। लोग भड़कने लगे। दबाव बढ़ा तो उससे इस्तीफा देने को कहा गया। दीपू हाथ जोड़ता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था। 5 बजे शुरू हुआ हंगामा 8 बजे तक उन्माद बन चुका था। हजारों लोग फैक्ट्री के बाहर जमा हो गए। हाईवे जाम हो गया। पुलिस को खबर दी गई, लेकिन पुलिस रास्ते में ही फंस गई।
भीड़ ने फैक्ट्री का गेट तोड़ दिया। दीपू को केबिन से घसीटकर बाहर निकाला गया। कोई लात मार रहा था, कोई डंडा, कोई वीडियो बना रहा था। उसे पेड़ से बांध दिया गया। केरोसिन डाला गया। तालियां बज रही थीं। नारे लग रहे थे। और फिर उसे जिंदा जला दिया गया।
कुछ ही देर में दीपू की सांसें भी थम गईं।
बाद में जांच हुई। सोशल मीडिया खंगाला गया। सच्चाई सामने आई—दीपू ने कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की ही नहीं थी। वह बेगुनाह था। लेकिन तब तक सब खत्म हो चुका था।
दो देश।
दो मजदूर।
दो अलग घटनाएं।
लेकिन एक ही सच—भीड़ जब फैसला करने लगती है, तो इंसान सबसे पहले मरता है।
यह कहानी किसी धर्म, किसी देश या किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है। यह कहानी उस सोच के खिलाफ है, जहां शक को सबूत बना दिया जाता है और इंसानियत को कुचल दिया जाता है।
कभी भाषा न समझ पाने की सजा मौत बन जाती है,
तो कभी अफवाह जान ले लेती है।
और सवाल वही रह जाता है—
क्या हम इंसान हैं, या सिर्फ भीड़ का हिस्सा?
जय हिंद। इंसानियत जिंदा रहे।