कई सीरियल किलर्स की कहानियाँ आपने सुनी होंगी, लेकिन 2009 में गोवा में जो हुआ, वो इसलिए डरावना था क्योंकि आख़िरी पल तक पुलिस को यह एहसास ही नहीं हुआ कि उनके शहर में एक सीरियल किलर घूम रहा है। एक-एक कर लड़कियाँ गायब होती रहीं, अलग-अलग थानों में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होती रही, लेकिन किसी ने उन मामलों को आपस में जोड़कर देखने की कोशिश नहीं की। यही वो गलती थी जिसकी कीमत 16 लड़कियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
जनवरी 2009 की बात है। गोवा के पोंडा पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पड़ने वाले मोरले सत्तरी जंगल से गुजर रहे एक राहगीर की नजर झाड़ियों के बीच पड़ी एक लाश पर पड़ती है। पुलिस को खबर दी जाती है। मौके पर पहुंची पुलिस को जंगल में करीब 24–25 साल की एक लड़की की लाश मिलती है। पोस्टमार्टम होता है, लेकिन लड़की की पहचान नहीं हो पाती। न कोई कागज़, न कोई ऐसा सबूत जिससे यह पता चल सके कि वह कौन थी या कहां से आई थी। पुलिस इसे एक सामान्य लावारिस मामला मानकर ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती और तय वक्त के बाद अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।
इसी दौरान कुछ दिन बाद उसी पोंडा पुलिस स्टेशन में एक परिवार अपनी बेटी योगिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने आता है। उम्र, हुलिया, कपड़े, सब कुछ बताया जाता है। लेकिन पुलिस का रवैया वही पुराना रहता है। माना जाता है कि शायद कहीं चली गई होगी, किसी के साथ भाग गई होगी। मामला हल्के में ले लिया जाता है। योगिता के मां-बाप परेशान होकर रिश्तेदारों, दोस्तों और जान-पहचान वालों के पास भटकते हैं, लेकिन बेटी का कोई सुराग नहीं मिलता।
जब हफ्तों गुजर जाते हैं और पुलिस की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब योगिता के माता-पिता स्थानीय नेताओं के पास पहुंचते हैं। दबाव बनता है, प्रदर्शन की नौबत आती है और तब जाकर पुलिस सच में हरकत में आती है। अब जब जांच शुरू होती है तो पुलिस को अचानक याद आता है कि कुछ दिन पहले इसी इलाके के जंगल से एक लड़की की लाश मिली थी। उस लाश से जुड़ी फाइलें दोबारा निकाली जाती हैं। कपड़े, फोटो और पोस्टमार्टम रिपोर्ट योगिता के माता-पिता को दिखाई जाती हैं। जैसे ही वे कपड़े देखते हैं, सब कुछ साफ हो जाता है। जंगल में मिली लाश योगिता की ही थी।
अब मामला पूरी तरह बदल चुका था। यह सिर्फ गुमशुदगी नहीं, बल्कि हत्या थी। पुलिस पर दबाव और बढ़ जाता है। जांच आगे बढ़ती है। योगिता का मोबाइल फोन गायब था। उसके कॉल रिकॉर्ड खंगाले जाते हैं। जिस दिन वह घर से निकली थी, उस दिन की आख़िरी कॉल पर पुलिस का ध्यान जाता है। वह कॉल एक ऐसे नंबर से आई थी जो गोवा की ही एक लड़की शर्मीला के नाम पर रजिस्टर्ड था।
पुलिस शर्मीला तक पहुंचती है। फोटो दिखाई जाती है। वह कहती है कि वह योगिता को नहीं जानती। सवाल उठता है कि जब जानती नहीं है तो उसके मोबाइल से आख़िरी कॉल कैसे हुई। तब शर्मीला बताती है कि मोबाइल उसका जरूर है, लेकिन वह कॉल उसने नहीं की थी। उसका एक दोस्त महानंद अक्सर उसका मोबाइल इस्तेमाल करता था और उसी ने यह कॉल किया था।
यहीं से जांच एक नए मोड़ पर पहुंचती है। पुलिस जब सख्ती से पूछताछ करती है तो शर्मीला टूट जाती है और बताती है कि महानंद ने उससे शादी का वादा किया था, उसका वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया और लंबे समय से उसका शोषण कर रहा था। अब पुलिस को समझ आता है कि शर्मीला सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि खुद एक पीड़िता है। सारा शक अब महानंद पर टिक जाता है।
पुलिस योजना बनाती है और शर्मीला के जरिए महानंद को मिलने के लिए बुलाया जाता है। जैसे ही वह आता है, पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है। शुरुआत में वह पुलिस को घुमाने की कोशिश करता है, लेकिन जब सबूत सामने रखे जाते हैं तो वह टूट जाता है और जो कहानी वह बताता है, वह पुलिस को भी सन्न कर देती है।
महानंद कबूल करता है कि योगिता उसकी 16वीं शिकार थी और शर्मीला उसकी तय की गई 17वीं शिकार। वह गोवा में गरीब और मध्यम वर्ग की उन लड़कियों को निशाना बनाता था जिनके मां-बाप दहेज की वजह से परेशान रहते थे। वह खुद को नौकरीपेशा, शरीफ और बिना दहेज शादी करने वाला लड़का बताता था। माता-पिता का भरोसा जीतने के बाद वह लड़की से कहता कि उसे अपने मां-बाप से मिलाना है और उनके पुराने ख्यालों का हवाला देकर दुल्हन के लिबास में आने को कहता था।
लड़की पूरे भरोसे के साथ दुल्हन बनकर उसके साथ जाती थी। वह उसे सुनसान जगह ले जाता, कहता कि माता-पिता आने वाले हैं। वहीं वह लड़की के साथ जबरदस्ती करता और फिर उसी दुपट्टे या चुन्नी से उसका गला घोंट देता। हत्या के बाद वह उसके गहने, पैसे और मोबाइल ले लेता और लाश को जंगल या नदी में ठिकाने लगा देता। हर बार वह अलग इलाके को चुनता था ताकि पुलिस किसी कड़ी को जोड़ न सके।
इसी तरीके से उसने करीब दो साल में 16 लड़कियों की जान ले ली। हर कत्ल के बाद वह अगली शिकार पहले ही चुन लेता था और पिछली लड़की के मोबाइल का इस्तेमाल करके उससे बात करता था। यही वजह थी कि उसने कभी अपने मोबाइल से किसी लड़की को कॉल नहीं किया और पुलिस तक उसकी पहचान नहीं पहुंची।
यह मामला तब खुला जब योगिता के मां-बाप ने बाकी परिवारों की तरह चुप रहने से इनकार कर दिया। उनकी जिद और संघर्ष ने न सिर्फ उनकी बेटी के कातिल को बेनकाब किया, बल्कि 15 और लड़कियों की मौत का सच भी सामने लाया। सबसे बड़ी बात यह रही कि शर्मीला की जान बच गई, जो अगली शिकार बनने वाली थी।
आज वह कातिल जेल में है। सज़ा अदालत ने तय की, लेकिन यह कहानी हमेशा याद दिलाती रहेगी कि अगर वक्त रहते कड़ियाँ जोड़ी जातीं, तो शायद 16 घर उजड़ने से बच सकते थे।