रात के सन्नाटे में कोलकाता हाई कोर्ट और रूम नंबर 11 से जुड़ी रहस्यमयी कहानी
अगर आम लोग भूत-प्रेत की बात करें तो हम कह देते हैं—डर है, वहम है, दिमाग का खेल है। लेकिन ज़रा सोचिए, जब वही बात उस जगह से निकले जहाँ कानून की सबसे मोटी किताबें खुलती हैं, जहाँ हर फैसला सबूत और तर्क पर टिका होता है, जहाँ अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं होती—तो फिर?
यह कहानी है Kolkata High Court की।
देश की सबसे पुरानी अदालतों में से एक। अंग्रेज़ों के ज़माने में बनी हुई एक भव्य इमारत, जो दिन में ज़िंदा रहती है और शाम होते-होते जैसे खुद को समेट लेती है। लंबे कॉरिडोर, ऊँचे पिलर, और बीच में वो घुमावदार सीढ़ियाँ… जिनके पास है रूम नंबर 11।
2022 की बात है। नवंबर का महीना। एक बड़ा मामला चल रहा था। बहस लंबी हो गई तो जज ने कहा कि सुनवाई शाम चार से सात बजे तक चलेगी। बस इतना सुनते ही कोर्ट में बैठे कई लोग असहज हो गए। वकीलों ने एक-दूसरे की तरफ देखा, स्टाफ के चेहरे बदल गए। किसी ने हिम्मत करके कहा—“माई लॉर्ड, शाम के बाद उस हिस्से में सुनवाई ठीक नहीं रहती।”
जज ने पूछा—“क्यों?”
जवाब आया—“रूम नंबर 11 की कहानियाँ…”
यहीं जज कुछ पल के लिए रुके और बोले—“हां… मुझे याद है। यह बातें पूरी तरह झूठी नहीं हैं।”
इतना कहना था कि कोर्ट में सन्नाटा छा गया। सुनवाई का वक्त बदल दिया गया, लेकिन एक जज का यह कहना कि वहाँ कुछ अजीब होता है—बस यहीं से कहानी फिर ज़िंदा हो गई।
अब बात सिर्फ अफ़वाहों की नहीं थी। एक पुलिसकर्मी की घटना सामने आई। शाम करीब सात-आठ बजे का वक्त था। वह एक जज की सुरक्षा में तैनात था। वॉशरूम जाने के लिए वह उसी तरफ गया, जहाँ रूम नंबर 11 की सीढ़ियाँ हैं। लौटते वक्त अचानक उसे पीछे से ज़ोर का धक्का लगा। वह सीढ़ियों से गिर पड़ा। जैसे-तैसे संभलकर उसने पीछे देखा—एक महिला खड़ी थी। साड़ी पहने हुए, पैरों में पायल। पैर से लेकर कंधे तक सब साफ दिख रहा था, लेकिन कंधे के ऊपर कुछ नहीं। कोई सिर नहीं। उसके बाद वह पुलिसकर्मी वहीं बेहोश हो गया।
इस घटना के बाद काफी समय तक उस इलाके में पुलिस की ड्यूटी लगा दी गई, ताकि कोई गलती से भी उधर न जाए।
इससे भी पुरानी एक कहानी है। ब्रिटिश दौर की। एक कवि था—तपस। आज़ादी से जुड़े लेखन के आरोप में उसे मौत की सज़ा मिली। कहा जाता है कि जेल में उसे पानी तक नहीं दिया गया और वह तड़प-तड़प कर मरा। आज भी कुछ लोगों का दावा है कि रूम नंबर 11 के पास रखे पानी के मटके के आसपास एक साया दिखाई देता है, जैसे कोई प्यासा अब भी भटक रहा हो।
फिर धीरे-धीरे एक नई बात सामने आने लगी। शाम ढलते ही पायल की आवाज़। छन-छन… हल्की, लेकिन साफ। लोगों ने कहा—एक औरत गुजरती है। पैर दिखते हैं, साड़ी दिखती है, लेकिन सिर नहीं दिखता। यह बात सिर्फ स्टाफ तक सीमित नहीं रही। पुलिस वालों ने सुना, वकीलों ने महसूस किया, और कुछ जजों ने भी माना कि रात में वह जगह अलग ही लगती है।
सबसे दर्दनाक कहानी निस्तार की है। कोलकाता के रेड-लाइट इलाके में रहने वाली निस्तार को एक शरीफ व्यापारी से प्यार हो गया। वह उससे शादी करना चाहता था, उसे इज़्ज़त की ज़िंदगी देना चाहता था। निस्तार ने अदालत में अर्जी दी कि उसके नाम के आगे सरकारी कागज़ों में लिखा “वेश्या” शब्द हटा दिया जाए। अदालत ने अर्जी खारिज कर दी। कुछ वक्त बाद निस्तार की लाश मिली। शरीर था, लेकिन सिर नहीं मिला। तभी से कहा जाने लगा कि जो बिना सिर की औरत पायल बजाती हुई भटकती है, वह निस्तार ही है—जिसे अदालत से इंसाफ नहीं मिला।
आज भी कोलकाता हाई कोर्ट में रात की सुनवाई नहीं होती। एक पैरानॉर्मल संस्था ने पूरी रात रूम नंबर 11 में रुककर जांच करने की इजाज़त मांगी, लेकिन अनुमति नहीं मिली। शायद इसलिए क्योंकि अगर अदालत इजाज़त दे दे, तो यह मानना पड़ेगा कि कानून के रिकॉर्ड में भी कुछ ऐसा है जिसे समझाया नहीं जा सकता।
सच क्या है, कोई नहीं जानता। कोई सबूत नहीं, कोई रिपोर्ट नहीं।
लेकिन जब कानून की सबसे ऊँची कुर्सी से कोई कह दे कि “यह कहानी पूरी तरह झूठी नहीं है”—तो सवाल आज भी वहीं खड़ा है।
क्या कुछ जगहें अपनी अधूरी कहानियों को कभी जाने देती ही नहीं?