फ्रांस के नाइस शहर में हुई दुनिया की सबसे रहस्यमयी और बिना हिंसा वाली बैंक डकैती
यह कहानी है उस इंसान की जिसने साबित कर दिया कि जुर्म सिर्फ़ हथियारों से नहीं होता, कई बार दिमाग़ सबसे खतरनाक हथियार बन जाता है। यह कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि हकीकत है—इतनी हैरान कर देने वाली कि आज भी दुनिया इसे याद करती है।
फ्रांस के खूबसूरत शहर Nice में एक बैंक हुआ करता था, जिसका नाम था Société Générale। उस दौर में यह बैंक सुरक्षा की मिसाल माना जाता था। इसकी इमारत पुरानी जरूर थी, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था ऐसी कि लोग कहते थे—यहाँ चोरी होना नामुमकिन है।
बैंक का मुख्य दरवाज़ा लगभग 20 टन वज़नी था। रोज़ सुबह तय समय पर ही वह खुलता और शाम को बंद होने के बाद पूरी तरह सील कर दिया जाता। न कोई खिड़की, न कोई रोशनदान, न कोई ऐसा रास्ता जिससे कोई अंदर दाख़िल हो सके। दीवारों के भीतर लोहे की मोटी परतें लगी थीं। उस समय आधुनिक अलार्म और कैमरों का चलन बहुत कम था, इसलिए बैंक पूरी तरह इस विशाल दरवाज़े और मज़बूत दीवारों पर निर्भर था।
इसी शहर में रहता था एक फोटोग्राफर—Albert Spaggiari। अल्बर्ट बाहर से एक आम, शांत और रचनात्मक इंसान लगता था। कैमरा उसका साथी था और तस्वीरें उसका काम। लेकिन उसके भीतर एक अलग ही जुनून पल रहा था—दबे हुए ख़ज़ानों को खोजने का जुनून। उसने दुनिया के कई हिस्सों में घूमकर पुराने किले, गुफाएँ और ऐतिहासिक जगहें देखीं, लेकिन हर बार निराशा हाथ लगी।
धीरे-धीरे अल्बर्ट को एहसास होने लगा कि किताबों और कहानियों वाले ख़ज़ाने शायद हकीकत में नहीं मिलते। तभी उसके दिमाग में एक नया ख्याल आया—अगर ज़मीन के नीचे दबा ख़ज़ाना नहीं मिल रहा, तो क्यों न उस ख़ज़ाने को लूटा जाए जो ज़िंदा है, गिना जाता है और एक ही जगह पर रखा है? यानी बैंक।
उसकी नज़र Société Générale बैंक पर पड़ी। लेकिन अल्बर्ट कोई जल्दबाज़ चोर नहीं था। उसने सीधे चोरी की प्लानिंग शुरू नहीं की, बल्कि पहले बैंक को समझने का फैसला किया। उसने बैंक में एक अकाउंट खुलवाया, फिर एक लॉकर लिया। वह अक्सर बैंक आता-जाता, कभी ग्राहक बनकर, कभी फोटोग्राफर के तौर पर। वह कर्मचारियों की आदतें, बैंक खुलने-बंद होने का समय और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान से देखता रहता।
कुछ समय बाद उसे एक अहम बात समझ में आ गई—इस बैंक की पूरी सुरक्षा सिर्फ़ एक मुख्य दरवाज़े पर टिकी है। बैंक बंद होने के बाद अंदर कोई सुरक्षा गार्ड नहीं रहता था। न कोई आधुनिक अलार्म सिस्टम, न कोई सेंसर। यह जानकारी अल्बर्ट के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी।
अब सवाल था—अंदर जाएँ कैसे? दरवाज़ा और दीवार तोड़ना नामुमकिन था। तभी अल्बर्ट ने सोचा—ऊपर से नहीं, नीचे से रास्ता ढूंढो। उसने खुद को एक म्युनिसिपल इंजीनियर बताकर शहर के दफ़्तरों में एंट्री ली और वहाँ से शहर के नक्शे हासिल किए। इन नक्शों में एक बेहद अहम जानकारी छुपी थी—बैंक के ठीक नीचे से शहर की मुख्य सीवर लाइन गुजरती थी।
यहीं से इतिहास की सबसे अनोखी चोरी की नींव रखी गई। अल्बर्ट ने कुछ पेशेवर अपराधियों को अपने साथ जोड़ा। रात के अंधेरे में सीवर के रास्ते खुदाई शुरू हुई। बदबू, अंधेरा, खतरा—सब कुछ मौजूद था, लेकिन इरादा मज़बूत था। करीब दो महीनों की मेहनत के बाद लगभग 26 फीट लंबी एक सुरंग तैयार की गई, जो सीधे बैंक के वॉल्ट तक पहुँचती थी।
हवा की कमी न हो, इसके लिए वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया। तिजोरियाँ काटने के लिए गैस सिलेंडर जमा किए गए। हर चीज़ की प्लानिंग इतनी बारीकी से की गई थी कि गलती की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई।
चोरी के लिए शनिवार का दिन चुना गया, क्योंकि उसके बाद रविवार को बैंक बंद रहता था। शनिवार शाम जैसे ही बैंक बंद हुआ, अल्बर्ट और उसका गैंग सीवर के रास्ते सुरंग से होते हुए बैंक के अंदर दाख़िल हो गया। अगले पूरे 27 घंटे वे बैंक के अंदर रहे। उन्होंने तिजोरियाँ खोलीं, नकदी और ज्वेलरी इकट्ठा की, वहीं खाना खाया और बिना किसी घबराहट के अपना काम किया।
जाते-जाते उन्होंने मुख्य दरवाज़े को अंदर से वेल्ड कर दिया, ताकि सोमवार सुबह बैंक खुले ही नहीं। यह एक मास्टरस्ट्रोक था।
सोमवार को जब बैंक कर्मचारी आए, तो दरवाज़ा नहीं खुला। घंटों की कोशिश के बाद दीवार काटकर अंदर प्रवेश किया गया। अंदर का नज़ारा देखकर सभी के होश उड़ गए। बैंक पूरी तरह खाली था। करोड़ों की नकदी और गहने गायब थे। दीवार पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“बिना नफ़रत, बिना हिंसा।”
जांच में सामने आया कि करीब 900 करोड़ रुपये के बराबर नकदी और ज्वेलरी चोरी हो चुकी थी। यह खबर पूरी दुनिया की मीडिया में छा गई। महीनों तक पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा। बाद में अल्बर्ट पकड़ा गया, लेकिन अदालत में पेशी के दौरान वह खिड़की से कूदकर भाग निकला—जैसे किसी फिल्म का सीन हो।
आज भी यह रहस्य बना हुआ है कि चोरी का पूरा ख़ज़ाना कहाँ गया। 1989 में अल्बर्ट की मौत हो गई, लेकिन उसके साथ ही वह राज़ भी दफन हो गया।
यही वजह है कि यह कहानी सिर्फ़ एक बैंक डकैती नहीं, बल्कि दिमाग़, धैर्य और प्लानिंग की ऐसी मिसाल बन गई है, जहाँ बिना एक गोली चलाए, बिना किसी को नुकसान पहुँचाए, दुनिया के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले बैंक को लूट लिया गया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अपराध हमेशा हिंसा से नहीं होता, कई बार दिमाग़ और धैर्य सबसे बड़ा हथियार बन जाते हैं। अल्बर्ट स्पैजियारी की यह डकैती आज भी इतिहास की सबसे रहस्यमयी और दिमाग़ी वारदातों में गिनी जाती है, जहाँ बिना खून-खराबे के करोड़ों की चोरी कर ली गई।