चंबल के बीहड़ों में पनपी खौफनाक डकैतों की दास्तान
आपने चंबल के बीहड़ों की बहुत-सी कहानियाँ सुनी होंगी। कभी फूलन देवी, कभी पान सिंह तोमर, कभी मलखान सिंह या निर्भय सिंह गुर्जर। इन सब नामों ने चंबल को खून, बंदूक और दहशत की पहचान दी। लेकिन आज की कहानी इन सबसे अलग है। यह कहानी है दो ऐसे भाइयों की, जिनके पास शुरुआत में कुछ भी नहीं था—न पैसा, न जमीन, न सहारा। लेकिन समय के साथ उन्होंने ऐसा साम्राज्य खड़ा किया कि पुलिस ही नहीं, चंबल के दूसरे डाकू भी उनके नाम से कांपने लगे।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे रामबाबू और दयाराम गड़रिया की जिंदगी बचपन से ही बेरहम रही। बहुत छोटी उम्र में माता-पिता का साया उठ गया। दो छोटे बच्चे, पेट में भूख और सिर पर कोई नहीं। कभी इधर-उधर मजदूरी, कभी भीख—जिंदगी जैसे-तैसे चल रही थी। वक्त बीतता गया और दोनों भाई किशोरावस्था में पहुंच गए, लेकिन हालात नहीं बदले।
गरीबी ने धीरे-धीरे उन्हें गलत रास्ते पर धकेल दिया। पहले छोटी-मोटी चोरियां, फिर गांव वालों से झगड़े। एक दिन गांव के ही एक व्यक्ति से विवाद इतना बढ़ गया कि हत्या हो गई। उस दिन के बाद दोनों भाइयों के लिए गांव में रहना नामुमकिन हो गया। जान बचाने के लिए उन्होंने चंबल के बीहड़ों का रुख किया।
जंगल में अकेले रहना आसान नहीं था। कई दिन भटके, भूखे रहे, लेकिन यहीं उनकी मुलाकात एक सक्रिय डकैत गिरोह से हुई। उसी पल से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। बंदूक हाथ में आई और डर उनका हथियार बन गया। लूट, अपहरण और रंगदारी की घटनाएं बढ़ने लगीं। ग्वालियर और आसपास के इलाकों में उनका नाम तेजी से फैलने लगा।
कुछ ही समय में रामबाबू और दयाराम ने गिरोह के भीतर अपनी अलग पहचान बना ली। रामबाबू सबसे ज्यादा आक्रामक और चालाक था। उसका खौफ इतना था कि लोग बिना शिकायत किए फिरौती दे देते थे। कहते हैं, उनका असर सिर्फ जंगल तक सीमित नहीं था—स्थानीय राजनीति और पंचायत चुनावों तक में उनकी दखल होने लगी थी।
1999 में पुलिस ने दावा किया कि एक मुठभेड़ में रामबाबू मारा गया है। एक अफसर को प्रमोशन भी मिल गया। लेकिन कुछ समय बाद सच्चाई सामने आई। डीएनए रिपोर्ट ने बता दिया कि जिसे मारा गया था, वह रामबाबू नहीं था। यह खबर जंगल में आग की तरह फैली और रामबाबू की दहशत और बढ़ गई। लोग कहने लगे—“ये मरता नहीं है।”
गिरोह और मजबूत हुआ। रिश्तेदारों को भी शामिल किया गया। दिनदहाड़े पुलिस थानों के पास से गुजर जाना आम बात हो गई। पुलिस देखती रह जाती थी। दूसरी तरफ चंबल के दूसरे गिरोहों से दुश्मनी बढ़ती चली गई। मुखबिरी, बदला और कत्लेआम—बीहड़ों में तनाव चरम पर पहुंच चुका था।
एक घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया। ग्वालियर जिले के एक गांव में कई लोगों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी गई। इस वारदात के बाद सरकार ने साफ आदेश दे दिया—गड़रिया गिरोह जिंदा चाहिए या मुर्दा, फर्क नहीं पड़ता।
लगातार दबाव के बीच गिरोह ने आत्मसमर्पण पर विचार किया, लेकिन शर्तें ऐसी थीं जिन्हें पुलिस मानने को तैयार नहीं थी। बातचीत नाकाम रही। वक्त अब उनके खिलाफ जा चुका था।
2006 में एक मुठभेड़ में दयाराम गड़रिया मारा गया। यह रामबाबू के लिए सबसे बड़ा झटका था। भाई की मौत ने उसे अंदर से तोड़ दिया। वही गिरोह, वही जंगल, लेकिन अब पहले जैसी धार नहीं बची थी।
कुछ महीनों बाद 2007 में, एक और मुठभेड़ हुई। इस बार कहानी का अंत लिखा गया। रामबाबू गड़रिया भी मारा गया। चंबल के बीहड़ों में जिसका नाम कानून से बड़ा माना जाता था, वह नाम हमेशा के लिए खामोश हो गया।
गरीबी से शुरू हुई यह कहानी ताकत, खून और दहशत तक पहुंची—और अंत वही हुआ, जो अक्सर इस रास्ते पर चलने वालों का होता है।
अब सवाल यह है कि अगर हालात थोड़े अलग होते, तो क्या यह कहानी भी अलग होती?
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