यह तस्वीर AI द्वारा बनाई गई है, वास्तविक घटना का प्रतीकात्मक चित्रण
आज की कहानी किसी एक अपराध की नहीं,
बल्कि सिस्टम और समाज दोनों की नाकामी की है।
मध्य प्रदेश के सतना ज़िले की रहने वाली
एक 15 साल की बच्ची
रविवार को स्कॉलरशिप परीक्षा देने घर से निकली थी।
सेंटर पहुंचने पर पता चला कि उसका नाम लिस्ट में नहीं है।
बाकी बच्चियां परीक्षा देने चली गईं
और वह बच्ची अकेली रह गई।
घबराहट में वह पास के रेलवे स्टेशन पहुंची
और एक ट्रेन में बैठकर
करीब 736 किलोमीटर दूर उज्जैन पहुंच गई।
रात के 12–1 बजे
स्टेशन के बाहर ऑटो वालों से मदद मांगी।
एक ऑटो चालक ने भरोसा दिलाया
और उसे सुनसान जगह ले जाकर
उसके साथ दरिंदगी की।
खून बहने लगा तो
दूसरे ऑटो में डालकर
उसे सड़क किनारे फेंक दिया गया।
उस हालत में
वह बच्ची 8 किलोमीटर पैदल चली।
लोग मिले, घर मिले, दरवाज़े खटखटाए —
लेकिन किसी ने मदद नहीं की।
किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला।
आख़िरकार वह एक आश्रम के दरवाज़े पर पहुंची
और बेहोश होकर गिर पड़ी।
आश्रम के पुजारी ने पुलिस को सूचना दी।
उज्जैन पुलिस ने शुरुआत में
उसे “भीख मांगने वाली बच्ची” बताकर
रिपोर्ट लिख दी,
जबकि वह स्कूल ड्रेस में थी।
उधर सतना में
परिवार रात 10 बजे थाने पहुंचा,
लेकिन पुलिस ने कहा —
“कल तक इंतज़ार करो।”
अगले दिन अख़बार में फोटो छपी,
स्कूल ड्रेस से पहचान हुई
और सच्चाई सामने आई।
700 से ज़्यादा CCTV खंगालने के बाद
ऑटो चालक भरत सोनी पकड़ा गया।
अब वह जेल में है।
लेकिन सवाल अब भी खड़ा है—
अगर पुलिस समय पर जाग जाती,
अगर किसी एक इंसान ने दरवाज़ा खोल दिया होता,
तो क्या यह सब होता?
यह कहानी सिर्फ अपराध की नहीं,
यह कहानी हमारी बेरुख़ी की है।